Book Review: निर्मला (Nirmala)
Date - 09/07/2025
Themes: अनमेल विवाह, संदेह और अविश्वास, नारी की पराधीनता
Characters: निर्मला, मुंशी तोताराम, मंसाराम
यह किताब पढ़ने के बाद एक विचार मेरे मन में आया:
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शायद जीवन में कुछ ऐसे रिश्ते होते हैं, जिनका विफल होना निश्चित है। हर रिश्ते की जो सबसे महत्त्वपूर्ण इकाई होती है - वह है दोस्ती। सामने वाले के दुख-दर्द में साथ देना। परंतु कुछ ऐसे रिश्ते होते हैं, जिनकी सामाजिक परिभाषा शायद उनमें दोस्ती का बीज बोने से रोक देती है।
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एक गलत-फहमी का बीज कैसे एक विशालकाय बरगद का रूप ले लेता है और उसके बाद आप केवल उसे देख सकते हैं और उसकी पीड़ा महसूस कर सकते हैं। परंतु शायद एक समय पश्चात उसका समाधान करना उतना ही मुश्किल है जितना एक पेड़ को उखाड़ना।
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हर पात्र का नज़रिया बताया गया है। पढ़ने शायद ऐसा लगे की सब सही हैं। और सब के सही होने के बावजूद गलतफहमियां कैसे पनपती हैं।
यह कहानी निर्मला की है, जिसका 15 वर्ष की उम्र में एक 40 वर्षीय विधुर के साथ संबंध तय हो जाता है। कहानी यहाँ से चालू होती है और इन दोनों के और इनके जीवन से जुड़े अन्य लोगों के जीवन में क्या-क्या होता है उसका चित्र पेश करती है।
प्रेमचंद की जितनी भी किताबें मैंने पढ़ी हैं, उनमें ‘निर्मला’ का स्थान शायद सबसे ऊपर है। इस उपन्यास की लेखन शैली और इसका जो (Psychological perspective) है समाज के प्रति, उसकी सराहना जितनी की जाए उतनी कम है।